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शनिवार, 12 जनवरी 2019

बच्‍चे काम पर जा रहे हैं -राजेश जोशी

गूगल से साभार 
कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्‍चे काम पर जा रहे हैं
सुबह सुबह

बच्‍चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह

काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे?

क्‍या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्‍या दीमकों ने खा लिया हैं
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्‍या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्‍या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें
क्‍या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन
खत्‍म हो गए हैं एकाएक
तो फिर बचा ही क्‍या है इस दुनिया में?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्‍यादा यह
कि हैं सारी चीज़ें हस्‍बमामूल

पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजते हुए
बच्‍चे, बहुत छोटे छोटे बच्‍चे
काम पर जा रहे हैं।
-राजेश जोशी

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

मुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता -दाग़ देहलवी

गूगल से साभार 
 मुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता
मेरा मरना भी तो मेरी ख़ुशी से हो नही सकता



न रोना है तरीक़े का न हंसना है सलीके़ का
परेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकता


ख़ुदा जब दोस्त है ऐ 'दाग़' क्या दुश्मन से अन्देशा
हमारा कुछ किसी की दुश्मनी से हो नहीं सकता


गुरुवार, 10 जनवरी 2019

लापता लोग -शंकरानंद

गूगल से साभार 

लापता लोग अब लापता हैं
कितने बेबस हैं कितने लाचार
वे किस ग़लती की सज़ा भुगत रहे हैं कि
अपने हिस्से का जीवन भी उन्हें नसीब नहीं

लापता लोगों की रिपोर्ट थाने में दर्ज होकर सड़ जाती है
आखिर ऐसा क्यों होता है कि
उनका शव भी बरामद नहीं होता

आज तक जितने लोग लापता हुए
अगर सबको मिला दिया जाए तो
उनसे एक देश बन सकता है -- ऐसा कहते हैं आँकड़े

इतनी बड़ी आबादी का लापता होना पता नहीं चलता
उनका कोई सबूत नहीं कोई गवाह नहीं

वे सब सिर्फ़ एक नागरिक नहीं थे
किसी की माँ, किसी का पिता, किसी के बच्चे, किसी की बहन
किसी के भाई थे वे और वे लापता हो गए

इस तरह कि अब कभी उनकी वापसी नहीं होगी
वे अब मृतक हैं पर
मृतकों की सूची से बाहर ।
-शंकरानंद

बुधवार, 9 जनवरी 2019

चंपा के फूल -गीत चतुर्वेदी


(दो अजीब और अविश्वसनीय चीज़ों को जोडऩे का काम 
करते हैं उम्मीद और स्वप्न 
बुनियाद में बैठा भ्रम विश्वास का सहोदर है
उस कु़रबत का आलिंगन 
जो तमाम दूरियों से भी ताउम्र निराश नहीं होती)

कहा था, काँच हूँ, पार देख लोगे तुम मेरे 
मेरी पीठ पर क़लई लगाकर ख़ुद को भी देखोगे बहुत सच्चा 
जिस दिन टूटूंगा, गहरे चुभूंगा, किरचों को बुहारने को ये उम्र भी कम लगेगी 
तुमसे प्रेम करना हमेशा अपने भ्रम से खिलवाड़ करना रहा
स्वप्न में हुए एक सुंदर प्रणय को उचक कर छू लेना चाहता हूँ
लेकिन चंपा मेरी उचक से परे खिलती है
मैं उसकी छाँव में बैठा उसके झरने की प्रतीक्षा करता हूँ
एक अविश्वसनीय सुगंध 
उम्मीद की शक्ल में मेरे सपने में आती है 
मुझे देखो, मैं एक आदमक़द इंतज़ार हूँ
मैं सुबह की उस किरण को सांत्वना देता हूँ
जो तमाम हरियाली पर गिरकर भी कोई फूल न खिला सकी
चंपा के फूलों की पंखुडिय़ां सहलाता हूँ 
उनकी सुगंध से ख़ुद को भरता तुम्हारे कमरे के कृष्ण से पूछता हूँ 
चंपा के फूल पर कभी कोई भंवरा क्यों नहीं बैठता
दो पहाडिय़ों को सिर्फ़ पुल ही नहीं जोड़ते, खाई भी जोड़ती है

-गीत चतुर्वेदी

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

तुम मुझे मिलीं -पंकज चतुर्वेदी

गूगल से साभार 

तमाम निराशा के बीच
तुम मुझे मिलीं 
सुखद अचरज की तरह 
मुस्कान में ठिठक गए 
आंसू की तरह 

शहर में जब प्रेम का अकाल पड़ा था 
और भाषा में रह नहीं गया था 
उत्साह का जल 

तुम मुझे मिलीं 
ओस में भीगी हुई 
दूब की तरह 
दूब में मंगल की 
सूचना की तरह 

इतनी धूप थी कि पेड़ों की छांह 
अप्रासंगिक बनाती हुई 
इतनी चौंध 
कि स्वप्न के वितान को 
छितराती हुई 

तुम मुझे मिलीं 
थकान में उतरती हुई 
नींद की तरह 
नींद में अपने प्राणों के 
स्पर्श की तरह 

जब समय को था संशय 
इतिहास में उसे कहां होना है 
तुमको यह अनिश्चय 
तुम्हें क्या खोना है 
तब मैं तुम्हें खोजता था 
असमंजस की संध्या में नहीं 
निर्विकल्प उषा की लालिमा में 

तुम मुझे मिलीं 
निस्संग रास्ते में 
मित्र की तरह 
मित्रता की सरहद पर 
प्रेम की तरह
-पंकज चतुर्वेदी

सोमवार, 7 जनवरी 2019

और जीवन बीत गया -कुंवर नारायण

गूगल से साभार

इतना कुछ था दुनिया में
लड़ने झगड़ने को


पर ऐसा मन मिला
कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा

और जीवन बीत गया..।

-कुंवर नारायण

पहला आदमी नहीं वह -प्रांजल धर

गूगल से साभार 
पहली हार...
जन्म लेते ही मिली थी
पहला काम रोना,
रोते-रोते सोना ।
परिवार वालों ने कहा था
यह शिशु का ब्रह्मसाक्षात्कार है,
ज्योतिषी ने विचारा
इस पर किसी का
पिछले कुछ जनमों का काफी उधार है,
इसीलिए दुःख भरी मानव-जाति में
इसका अवतरण हुआ है ।
पहली कक्षा,
स्कूल जाने का मन नहीं हुआ,
स्कूल का पहला दिन
शाश्वत अज्ञानता का खण्डित प्रारम्भ था ।
पहला प्यार,
जिसका वह इजहार तक न कर सका,
रुकते-रुकते चला और चलते-चलते रुका !
पहला प्यार भी दूसरी पहली चीज़ों-सा
हाथ से निकल गया
लीक से फिसल गया...
भटकता रहा वह ।
पहली प्रेमिका
जिसके पहले ही ख़त में धोखा था
बहुतों ने समझाया
और मित्रों ने रोका था
समझकर क़दम बढ़ाना
फूँक-फूँक चलना और जाने क्या-क्या निर्देश !
पहली कविता,
जो उसने स्नेहस्निग्ध विरह में डूबकर लिखी,
खो गयी कहीं, पता नहीं उसका ।
पहला वादा,
जिसे अपनी मामूली ज़िन्दगी में
वह कभी पूरा न कर सका ।
यह बात हमेशा उसे सालती रही,
निरर्थकता-बोध के कड़े साँचे में ढालती रही ।
पहला सिद्धान्त,
जिसमें वह डूबा, ज़िन्दा रहने की ज़िद थी ।
पहला बेटा,
जिसने उसकी बात कभी न मानी ।
कॉरपोरेटीय आकांक्षाओं में डूबता-उतराता रहा,
पिता को धता बताता रहा ।
पहला समर्पण,
जो उसने हालात के आगे किया,
ज़िन्दगी भर मर-मर कर जिया ।
जीता रहा
और ज़िन्दगी जितनी लम्बी
निराशा का घूँट पीता रहा ।
फिर भी, वह जानता है
कि पहला आदमी नहीं वह
जिसने यह दंश झेला है
ज़िन्दगी ने उसे फुटबाल की तरह खेला है ।
और भी हैं,
जो उससे ज्यादा त्रस्त हैं, फिर भी मस्त हैं !
यही सन्तोष लिए वह
‘मेट्रो सिटी’ में रिक्शा खींचता रहता है,
खींचता रहता है आत्मीयता से ।
और रिक्शा उसे बेदर्दी से खींचता रहता है ।
-प्रांजल धर