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रविवार, 2 जून 2019

बालिका का परिचय --- सुभद्राकुमारी चौहान

यह मेरी गोदी की शोभा, सुख सोहाग की  है  लाली.
शाही शान भिखारन की है, मनोकामना मतवाली .

दीप-शिखा है अँधेरे की, घनी घटा की उजियाली .
उषा है यह काल-भृंग की, है पतझर की हरियाली .

सुधाधार यह नीरस दिल की, मस्ती मगन तपस्वी की.
जीवित ज्योति नष्ट नयनों की, सच्ची लगन मनस्वी की.

बीते हुए बालपन की यह, क्रीड़ापूर्ण वाटिका है .
वही मचलना, वही किलकना,हँसती हुई नाटिका है .

मेरा मंदिर,मेरी मसजिद, काबा काशी यह मेरी .
पूजा पाठ,ध्यान,जप,तप,है घट-घट वासी यह मेरी.

कृष्णचन्द्र की क्रीड़ाओं को अपने आंगन में देखो .
कौशल्या के मातृ-मोद को, अपने ही मन में देखो.

प्रभु ईसा की क्षमाशीलता, नबी मुहम्मद का विश्वास.
जीव-दया जिनवर गौतम की,आओ देखो इसके पास .

परिचय पूछ रहे हो मुझसे, कैसे परिचय दूँ इसका .
वही जान सकता है इसको, माता का दिल है जिसका .
-- सुभद्राकुमारी चौहान


सोमवार, 27 मई 2019

साध -- सुभद्राकुमारी चौहान

मृदुल कल्पना के चल पँखों पर हम तुम दोनों आसीन।  
भूल जगत के कोलाहल को रच लें अपनी सृष्टि नवीन।।   

वितत विजन के शांत प्रांत में कल्लोलिनी नदी के तीर।  
बनी हुई हो वहीं कहीं पर हम दोनों की पर्ण-कुटीर।।   

कुछ रूखा, सूखा खाकर ही पीतें हों सरिता  का जल।  
पर न कुटिल आक्षेप जगत के करने आवें हमें विकल।।   

सरल काव्य-सा सुंदर जीवन हम सानंद बिताते हों।  
तरु-दल की शीतल छाया में चल समीर-सा गाते हों।।   

सरिता के नीरव प्रवाह-सा बढ़ता हो अपना जीवन।  
हो उसकी प्रत्येक लहर में अपना एक निरालापन।।   

रचे रुचिर रचनाएँ जग में अमर प्राण भरने वाली।  
दिशि-दिशि को अपनी लाली से अनुरंजित करने वाली।।   

तुम कविता के प्राण बनो मैं उन प्राणों की आकुल तान।  
निर्जन वन को मुखरित कर दे प्रिय! अपना सम्मोहन गान।।
-- सुभद्राकुमारी चौहान