काव्य-धरा
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जितेन्द्र श्रीवास्तव
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मंगलवार, 29 जनवरी 2019
तुम्हारा होना-1 -जितेन्द्र श्रीवास्तव
तुम हो यहीं आस-पास
जैसे रहती हो घर में
घर से दूर
यह एक अकेला कमरा
भरा है तुम्हारे होने के अहसास से
होना
सिर्फ़ देह का होना कहाँ होता है !
-जितेन्द्र श्रीवास्तव
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