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गुरुवार, 7 मार्च 2019

अजनबी - दीप्ति नवल

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अजनबी रास्तों पर
पैदल चलें
कुछ न कहें

अपनी-अपनी तन्हाइयाँ लिए
सवालों के दायरों से निकलकर
रिवाज़ों की सरहदों के परे
हम यूँ ही साथ चलते रहें
कुछ न कहें
चलो दूर तक

तुम अपने माजी का
कोई ज़िक्र न छेड़ो
मैं भूली हुई
कोई नज़्म न दोहराऊँ
तुम कौन हो
मैं क्या हूँ
इन सब बातों को
बस, रहने दें

चलो दूर तक
अजनबी रास्तों पर पैदल चलें।

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- दीप्ति नवल

चित्र - गूगल से साभार 


नदी-गाथा - अच्युतानंद मिश्र

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नदी के अँधरे तल में
काँपती है पानी की छायाएँ
नदी का कोई चेहरा
अँधेरे में याद
नहीं कर पाता हूँ ।

रात के इस शमशानी सन्नाटे में
क्यों याद आती है नदी ?
पर मैं नदी को याद भी तो नहीं कर पा रहा हूँ
किस चेहरे से याद करूँ
नदी को ?
उस घाट से
जहाँ रग्घू धोबी और उसका परिवार
धोता था कपड़े
या उसे सिरे से जहाँ
ठकवा चाचा मारते थे मछली
या उस छोर से 
जो मेरी नन्हीं आँखों से 
बरबस बहती हुई चली आती थी

नदी के बारे में सोचना
ऐसा है जैसे
बुढ़ापे में बचपन के
किसी टूटे हुए खिलौने की याद 
बचपन में नदी एक
खिलौने की तरह ही तो थीं
मिट्टी के घर सबसे पहले
नदी के किनारे ही बनाए
पास के जंगल से
पुटूस के फूल
बिखेर देते थे हम 
पर तब तक सूरज
दूर चला जाता
और नदी का अँधेरा 
घर के दरवाज़ों के भीतर
प्रवेश कर जाता
हमें लौटना होता
अँधेरा बचपन से हमारी स्मृतियों में
लौटने जैसा ही कुछ था
पर एक दिन
कुछ बड़े होने पर 
पिता ने कहा -
‘अँधेरे में दिया जलाना चाहिए’
तो लगा अँधरे का मतलब
बदल रहा है
पर नदी का अँधेरा
अब तक यूँ ही
पसरा हुआ है, मेरे ज़ह्न में।
      
हम बड़े होते रहे
और नदी सिकुड़ती रही
अब हम मिट्टी के घर
नदी के किनारे नहीं बनाते
पुटूस के फूल कोई और
तोड़ लेता था
नदी चुपचाप सब कुछ देखती थी

नदी का चेहरा 
कभी नहीं उभर पाया
मेरी स्मृत्ति में
मैंने कई बार माँ को रोते हुए
नदी की तरह देखना चाहा था
पिता जब शाम को लौटकर
दालान के अँधेरे कोने में
बैठे होते
तो मैं उन्हें नदी की तरह
ख़ामोश पाता
पर इन दोनों में कोई भी चेहरा
नदी जैसा मुझे कभी नहीं लगा ।
गाँव की सबसे अधिक
हँसने वाली चाची के होंठों तले
दबा साड़ी का किनारा
कभी नदी के किनारों की तरह
नहीं कौधा मेरे जह्न में

बस कभी-कभी 
एक मिट्टी का घर
जिसमें कुछ अँधेरे, कुछ उजाले कोने होते
जैसी कुछ लगती थी नदी
अगले ही क्षण
मिट्टी का घर ठहकर टूट जाता
नदी का चेहरा बिखर जाता
अचानक से घर के वे बिखरे टुकड़े
नदी के अँधेरे तल में
समा जाते 
सब कुछ ख़ामोश हो जाता 

नदी के सबसे अधिक ख़ामोश
पाया है मैंने
बुढ़ापे में पिता से भी ज़्यादा
पति के घर से लौट आई
बहन से भी ज़्यादा

पर नदी हमेशा
ख़ामोश ही नहीं रही
नदी का चीख़ना भी सुना है मैंने
और देखा है लोगों की आँखों में
नदी का ख़ौफ़ भी
नदी की चीख़ ने 
बहुत ख़ामोश कर दिया था हमें
हम सबके चेहरों पर
मिट्टी के घरों का टूटना साफ़ नज़र आता
 
पर इस बार नदी बदल गई थी
उसके किनारे बच्चे खेलने नही जाते
पुटूस के जंगलो तक को नही छोड़ा था नदी ने
मिट्टी के घर अब नदी के किनारे
नहीं बनते
सिर्फ एक रेतीला विस्तार
जिसमें दूर से कभी-कभी पानी की चमक
कौंध जाती
नदी बहुत सिकुड़ चुकी थी
यह सिकुड़ना
शायद उसका पश्चाताप हो
शायद उसका दुःख
उसके बचपन की स्मृति
बुढ़ापे का कोई रोग
या शायद कुछ भी नहीं
कितने चेहरे उभरते हैं नदी के
और नदी बस नदी बनकर
बह जाती है
स्मृति में
शहर की चिल-पों में
सबसे उदास क्षणों में
सबसे अँधेरे पलों में
जागी रातों में
सिगरेट के धुएँ के बाहर
पुल पर ख़ामोश टहलते हुए
महसूसते हुए
घर के अँधेरे कोनों को
याद आती है
बचपन की नदी
मिट्टी का घर 
पुटूस के फूल
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- अच्युतानंद मिश्र

चित्र - गूगल से साभार 



मंगलवार, 5 मार्च 2019

जाते जाते वो मुझे - जावेद अख़्तर

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जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया 
उम्र भर दोहराऊँगा ऐसी कहानी दे गया 

उससे मैं कुछ पा सकूँ ऐसी कहाँ उम्मीद थी 
ग़म भी वो शायद बरा-ए-मेहरबानी दे गया 

सब हवायें ले गया मेरे समंदर की कोई 
और मुझ को एक कश्ती बादबानी दे गया 

ख़ैर मैं प्यासा रहा पर उस ने इतना तो किया 
मेरी पलकों की कतारों को वो पानी दे गया
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- जावेद अख़्तर

चित्र - गूगल से साभार 


सोमवार, 4 मार्च 2019

मन ने छाप लिया - रवीन्द्र भ्रमर

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आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।

रंग पंखुरी केसर टहनी नस-नस के सब ताने-बाने,
उनमें कोमल फूल बना जो, भोली आँख उसे ही जाने,
मन ने सौरभ के वातायन से--
असली रस भाँप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था
मन ने उसको छाप लिया।

छवि की गरिमा से मंडित, उस तन की मानक ऊँचाई को,
स्नेह-राग से उद्वेलित उस मन की विह्वल तरुणाई को,
आँखों ने छूना भर चाहा,
मन ने पूरा नाप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।

आँख पुजारी है, पूजा में भर अँजुरी नैवेद्य चढ़ाए,
वेणी गूँथे, रचे महावर, आभूषण ले अंग सजाए,
मन ने जीवन-मंदिर में-
उस प्रतिमा को ही थाप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।
- रवीन्द्र भ्रमर

चित्र - गूगल से साभार 


रविवार, 3 मार्च 2019

एक दिन औरत का दिन होगा - जया जादवानी

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एक दिन औरत का दिन होगा
एक दिन वह खिलाएगी
दूध से सनी रोटियां
दुनिया के सारे बच्चों को
एक दिन होंगी उसकी छातियां
प्रेम की नदी से भरपूर
वह चलना सिखाएगी
दुनिया की सारी सभ्यताओं को
वह हंसेगी कि
उसकी हंसी में होगी सिर्फ हंसी
और कुछ नहीं होगा
गीत फूटेंगे होंठों से
लोरियां बनकर
वह स्थगित कर देगी
सारे युद्ध, सारे धर्म
वह एतबार का पाठ पढ़ाएगी
एक दिन औरत का दिन होगा
जब हम जान नहीं पाएंगे उसका सुख
क्योंकि हम कभी जान नहीं पाए
दुःख उसका...!
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- जया जादवानी

चित्र - गूगल से साभार 


शनिवार, 2 मार्च 2019

सोचना ही फ़ज़ूल है शायद - राजेन्द्र टोकी

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सोचना ही फ़ज़ूल है शायद
ज़िन्दगी एक भूल है शायद

हर नज़ारा दिखाई दे धुँधला
मेरी आँखों पे धूल है शायद

इक अजब -सा सुकून है दिल में
आपका ग़म क़ुबूल है शायद

दिस्ती प्यार दुश्मनी नफ़रत
यूँ लगे सब फ़ज़ूल है शायद

किस क़दर चुभ रहा हूँ मैं सबको
मेरे दामन में फूल है शायद
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- राजेन्द्र टोकी


चित्र - गूगल से साभार

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

दिल, मेरी कायनात अकेली है—और मैं - शमशेर बहादुर सिंह

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दिल, मेरी कायनात अकेली है—और मैं !
बस अब ख़ुदा की जात अकेली है, और मैं !

तुम झूठ और सपने का रंगीन फ़र्क थे :
तुम क्या, ये एक बात है, और मैं !

सब पार उतर गए हैं, अकेला किनारा है :
लहरें अकेली रात अकेली है, और मैं !

तुम हो भी, और नहीं भी हो— इतने हसीन हो :
यह कितनी प्यारी रात अकेली है, और मैं !

मेरी तमाम रात का सरमाया एक शम‍अ
ख़ामोश, बेसबात, अकेली है— और मैं !

'शमशेर' किस को ढूँढ़ रहे हो हयात में
बेजान-सी इयात अकेली है, और मैं !
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- शमशेर बहादुर सिंह


चित्र - गूगल से साभार