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बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

मैं कहीं नहीं - जेन्नी शबनम

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हर बार की तरह
निष्ठुर बन 
फिर चले गए तुम
मुझे मेरे प्रश्नों में जलने के लिए छोड़ गए 
वो प्रश्न 
जिसके उत्तर तलाशती हुई मैं
एक बार जैसे नदी बन गई थी 
और बिरहा के आँसू 
बरखा की बूंदों में लपेट-लपेट कर 
नदी में प्रवाहित कर रही थी
और खुद से पूछती रही 
क्या सिर्फ मैं दोषी हूँ?

क्या उस दिन मैंने कहा था कि चलो
चलकर चखें उस झील के पानी को
जिसमें सुना है 
कभी किसी राजा ने 
अपनी प्रेमिका के संग 
ठिठुरते ठण्ड में स्नान किया था 
ताकि काया कंचन सी हो जाए
और अनन्त काल तक वे चिर युवा रहें 

वो पहला इशारा भी तुमने ही किया 
कि चलो चांदनी को मुट्ठी में भर लें
क्या मालूम मुफलिसी के अंधेरों का 
जाने कब जिन्दगी में अँधियारा भर जाए
मुट्ठी खोल एक दूसरे के मुँह पर झोंक देंगे 
होंठ खामोश भी हो 
मगर 
आँखें तो देख सकेंगी एक झलक
और उस दिन भी तो तुम ही थे न
जिसने चुपके से कानों में कहा था
मैं हूँ न, मुझसे बाँट लिया करो अपना दर्द
अपना दर्द भला कैसे बाँटती तुमसे
तुमने कभी खुशी को भी सुनना नहीं चाहा
क्योंकि मालूम था तुम्हें 
मेरे जीवन का अमावस
जानती थी 
तुमने कहने के लिए सिर्फ कहा था 
मैं हूँ न 
मानने के लिए नहीं

एक दिन कहा था तुमने 
वक्त के साथ चलो
मन में बहुत रंजिश है
तुम्हारे लिए भी और वक्त के लिए भी 
फिर भी चल रही हूँ वक्त के साथ 
रोज रोज प्रतीक्षा की मियाद बढाते रहे तुम
मेरे संवाद और सन्देश फ़िज़ूल होते गए 
वक्त के साथ चलने का मेरा वादा 
अब भी कायम है 
करना सवाल खुद से कभी 
कोई वादा कब तोड़ा मैंने?
वक्त से बाहर कब गयी भला?
क्या उस वक्त मैं वक्त के साथ नहीं चली थी?

कितनी लंबी प्रतीक्षा
और फिर जब सुना
मैं हूँ न 
उसके बाद ये सब कैसे
क्या सारी तहजीब भूल गए?
मेरे सँभलने तक रुक तो सकते थे 
या इतना कह कर जाते 
मैं कहीं नहीं
कमसे कम प्रतीक्षा का अंत तो होता 

तुम बेहतर जानते हो 
मेरी जिन्दगी तो तब भी थी तुम्हारे ही साथ
अब भी है तुम्हारे ही साथ
फर्क ये है कि तुम अब भी नहीं जानते मुझे 
और मैं तुम्हें 
कतरा-कतरा जीने में 
सर्वस्व पी चुकी हूँ.
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- जेन्नी शबनम

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

तुम हकीकत नहीं हो हसरत हो - जॉन एलिया

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो

तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू
और इतने ही बेमुरव्वत हो

तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं
यानी ऐसा है जैसे फुरक़त हो 

है मेरी आरज़ू के मेरे सिवा
तुम्हें सब शायरों से वहशत हो

किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ
तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो 

किसलिए देखते हो आईना 
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो

दास्ताँ ख़त्म होने वाली है
तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
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जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में - अदम गोंडवी

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जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में
गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गयी
राम सुधि की झौपड़ी सरपंच की चौपाल में

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए
हम को पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में
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-अदम गोंडवी


शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

मैं सुमन हूँ - द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

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व्योम के नीचे खुला आवास मेरा;
ग्रीष्म, वर्षा, शीत का अभ्यास मेरा;
झेलता हूँ मार मारूत की निरंतर, 
खेलता यों जिंदगी का खेल हंसकर। 
शूल का दिन रात मेरा साथ किंतु प्रसन्न मन हूँ
मैं सुमन हूँ...

तोड़ने को जिस किसी का हाथ बढ़ता, 
मैं विहंस उसके गले का हार बनता; 
राह पर बिछना कि चढ़ना देवता पर, 
बात हैं मेरे लिए दोनों बराबर। 
मैं लुटाने को हृदय में भरे स्नेहिल सुरभि-कन हूँ
मैं सुमन हूँ...

रूप का श्रृंगार यदि मैंने किया है, 
साथ शव का भी हमेशा ही दिया है; 
खिल उठा हूँ यदि सुनहरे प्रात में मैं, 
मुस्कराया हूँ अंधेरी रात में मैं। 
मानता सौन्दर्य को- जीवन-कला का संतुलन हूँ
मैं सुमन हूँ...
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- द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी


शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं - गुलज़ार

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क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ 
जुनूँ ये मजबूर कर रहा है पलट के देखूँ 
ख़ुदी ये कहती है मोड़ मुड़ जा 
अगरचे एहसास कह रहा है 
खुले दरीचे के पीछे दो आँखें झाँकती हैं 
अभी मेरे इंतज़ार में वो भी जागती है 
कहीं तो उस के गोशा-ए-दिल में दर्द होगा 
उसे ये ज़िद है कि मैं पुकारूँ 
मुझे तक़ाज़ा है वो बुला ले 
क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं 
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ 
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-गुलज़ार


मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

कविता की ज़रूरत - कुंवर नारायण

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बहुत कुछ दे सकती है कविता 
क्यों कि बहुत कुछ हो सकती है कविता
ज़िन्दगी में 

अगर हम जगह दें उसे 
जैसे फलों को जगह देते हैं पेड़
जैसे तारों को जगह देती है रात 

हम बचाये रख सकते हैं उसके लिए 
अपने अन्दर कहीं 
ऐसा एक कोना 
जहाँ ज़मीन और आसमान 
जहाँ आदमी और भगवान के बीच दूरी 
कम से कम हो ।

वैसे कोई चाहे तो जी सकता है 
एक नितान्त कवितारहित ज़िन्दगी 
कर सकता है 
कवितारहित प्रेम
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- कुंवर नारायण


शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

इसी काया में मोक्ष - दिनेश कुशवाह


बहुत दिनों से मैं 
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूं 
जिसे देखते ही लगे
इसी से तो मिलना था।



एक ऐसा आदमी जिसे पाकर 
यह देह रोज़ ही जन्मे, रोज़ ही मरे 
झरे हरसिंगार की तरह 
जिसे पाकर मन 
फूलकर कुप्पा हो जाए।



बहुत दिनों से मैं 
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ
जिसे देखते ही लगे
अगर पूरी दुनिया अपनी आँखों नहीं देखी
तो भी यह जन्म व्यर्थ नहीं गया। 



बहुत दिनों से मैं 
किसी को अपना कलेजा
निकालकर दे देना चाहता हूँ
मुद्दतों से मेरे सीने में 
भर गया है अपार मर्म
मैं चाहता हूं कोई 
मेरे पास भूखे शिशु की तरह आए
कोई मथ डाले मेरे भीतर का समुद्र
और निकाल ले सारे रतन।
बहुत दिनों से मैं 
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ
जिसे देखते ही 
भक्क से बर जाए आँखों में लौ
और लगे कि दीया लेकर खोजने पर ही
मिलेगा धरती पर ऐसा मनुष्य
कि पा गया मैं उसे
जिसे मेरे पुरखे गंगा नहाकर पाते थे
बहुत दिनों से मैं 
जानना चाहता हूँ 
कैसा होता है मन की सुन्दरता का मानसरोवर
छूना चाहता हूँ तन की सुन्दरता का शिखर
मैं चाहता हूँ मिले कोई ऐसा
जिससे मन हज़ार बहानो से मिलना चाहे। 



बहुत दिनों से मैं 
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ
जिसे देखते ही लगे
करोड़ों जन्मों के पाप मिट गए
कट गए सारे बंधन
कि मोक्ष मिल गया इसी काया में। 
- दिनेश कुशवाह