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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

बसन्त आया - रघुवीर सहाय

जैसे बहन 'दा' कहती है
ऐसे किसी बँगले के किसी तरु( अशोक?) पर कोइ चिड़िया कुऊकी
चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराये पाँव तले
ऊँचे तरुवर से गिरे
बड़े-बड़े पियराये पत्ते
कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहायी हो-
खिली हुई हवा आयी फिरकी-सी आयी, चली गयी।
ऐसे, फ़ुटपाथ पर चलते-चलते-चलते
कल मैंने जाना कि बसन्त आया।

और यह कैलेण्डर से मालूम था
अमुक दिन वार मदनमहीने कि होवेगी पंचमी
दफ़्तर में छुट्टी थी- यह था प्रमाण
और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था
कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल
आम बौर आवेंगे
रंग-रस-गन्ध से लदे-फँदे दूर के विदेश के
वे नन्दनवन होंगे यशस्वी
मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व
अभ्यास करके दिखावेंगे
यही नहीं जाना था कि आज के नग्ण्य दिन जानूंगा
जैसे मैने जाना, कि बसन्त आया।
- रघुवीर सहाय

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

बस इतना--अब चलना होगा - भगवतीचरण वर्मा


बस इतना--अब चलना होगा
फिर अपनी-अपनी राह हमें।

कल ले आई थी खींच, आज
ले चली खींचकर चाह हमें
तुम जान न पाईं मुझे, और
तुम मेरे लिए पहेली थीं;
पर इसका दुख क्या? मिल न सकी
प्रिय जब अपनी ही थाह हमें।

तुम मुझे भिखारी समझें थीं,
मैंने समझा अधिकार मुझे
तुम आत्म-समर्पण से सिहरीं,
था बना वही तो प्यार मुझे।

तुम लोक-लाज की चेरी थीं,
मैं अपना ही दीवाना था
ले चलीं पराजय तुम हँसकर,
दे चलीं विजय का भार मुझे।

सुख से वंचित कर गया सुमुखि,
वह अपना ही अभिमान तुम्हें
अभिशाप बन गया अपना ही
अपनी ममता का ज्ञान तुम्हें
तुम बुरा न मानो, सच कह दूँ,
तुम समझ न पाईं जीवन को
जन-रव के स्वर में भूल गया
अपने प्राणों का गान तुम्हें।

था प्रेम किया हमने-तुमने
इतना कर लेना याद प्रिये,
बस फिर कर देना वहीं क्षमा
यह पल-भर का उन्माद प्रिये।
फिर मिलना होगा या कि नहीं
हँसकर तो दे लो आज विदा
तुम जहाँ रहो, आबाद रहो,
यह मेरा आशीर्वाद प्रिये।
- भगवतीचरण वर्मा

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

धार-धार प्रेम की कथा कही -आशुतोष द्विवेदी

धार-धार प्रेम की कथा कही,
आँसुओं ने बात और क्या कही !


भूल गए जीत, हार, जन्म और मरण 
साँवरे की वंशी का कर लिया वरण
प्रेम-प्रेम बस हृदय में और कुछ न था 
एक रूप कृष्ण-राधिका हुए यथा 
इस प्रकार चक्षुओं से झाँकते हुए, 
गोपियों की विरह-वेदना कही 


प्रेम का पवित्र रूप भंग कर दिया 
लांछनों ने प्रेम को अपंग कर दिया 
प्रेम को भी एक खेल जानने लगे
लोग भ्रम भरे विचार मानने लगे
रोकने की लाख कोशिशों के बाद भी
बार-बार एक ही व्यथा कही 


प्रेम ब्रह्म का दिया अनूप दान है
प्रेम परम इष्ट का अखंड ध्यान है
प्रेम का हमें ये पुरस्कार क्या मिला !
दर्द का अटूट एक सिलसिला मिला 
कष्ट में भी है प्रसन्नता छिपी हुई,
बात यही गीत में समा कही
-आशुतोष द्विवेदी

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

तू जो मुझसे जुदा नहीं होता -गौतम राजरिशी


तू जो मुझसे जुदा नहीं होता
मैं ख़ुदा से खफ़ा नहीं होता

ये जो कंधे नहीं तुझे मिलते
तू तो इतना बड़ा नहीं होता

चाँद मिलता न राह में उस रोज
इश्क़ का हादसा नहीं होता

पूछते रहते हाल-चाल अगर
फ़ासला यूं बढ़ा नहीं होता

छेड़ते तुम न गर निगाहों से
मन मेरा मनचला नहीं होता

होती हर शै पे मिल्कियत कैसे
तू मेरा गर हुआ नहीं होता

कहती है माँ, कहूँ मैं सच हरदम
क्या करूँ, हौसला नहीं होता
-गौतम राजरिशी

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

निर्वासित औरत की कविताएँ -लाल्टू

(बांग्लादेश की प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन पर हैदराबाद में पुस्तक लोकार्पण के दौरान कट्टरपंथियों ने हमला किया। इस शर्मनाक घटना से आहत मैं इस बेहूदा हरकत की निंदा करता हूँ। जैसा कि तसलीमा ने ख़ुद कहा है ये लोग भारत की बहुसंख्यक जनता का हिस्सा नहीं हैं, जो वैचारिक स्वाधीनता और विविधता का सम्मान करती है। तसलीमा को मैं नहीं जानता। पर हर तरक्कीपसंद इंसान की तरह मुझे उनसे बहुत प्यार है। १९९५ में बांग्ला भाषा की 'देश' नामक पत्रिका में तसलीमा की सोलह कविताएँ प्रकाशित हुईं थीं। उन्हें पढ़कर मैंने यह कविता लिखी थी।)


मैं हर वक्त कविताएँ नहीं लिख सकता
दुनिया में कई काम हैं । कई सभाओं से लौटता हूँ
कई लोगों से बचने की कोशिश में थका हूँ
आज वैसे भी ठंड के बादल सिर पर गिरते रहे


पर पढ़ी कविताएँ तुम्हारी तस्लीमा

सोलह कविताएँ निर्वासित औरत की 
तुम्हारी कल्पना करता हूँ तुम्हारे लिखे देशों में


जैसे तुमने देखा ख़ुद को एक से दूसरा देश लाँघते हुए

जैसे चूमा ख़ुद को भीड़ में से आए कुछेक होंठों से


देखता हूँ तुम्हें तस्लीमा

पैंतीस का तुम्हारा शरीर
सोचता हूँ बार-बार
कविता न लिख पाने की यातना में
ईर्ष्या अचंभा पता नहीं क्या-क्या
मन में होता तुम्हें सोचकर

एक ही बात रहती निरंतर

चाहत तुम्हें प्यार करने की जी भर।
-लाल्टू

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

तेरे बिन -रमेश गौड़


जैसे सूखा ताल बचा रहे या कुछ कंकड़ या कुछ काई
जैसे धूल भरे मेले में चलने लगे साथ तन्हाई,
तेरे बिन मेरे होने का मतलब कुछ-कुछ ऐसा ही है
जैसे सिफ़रों की क़तार बाक़ी हर जाए बिन इकाई ।

जैसे ध्रुवतारा बेबस हो, स्याही सागर में घुल जाए
जैसे बरसों बाद मिली चिट्ठी भी बिना पढ़े धुल जाए,
तेरे बिन मेरे होने का मतलब कुछ-कुछ ऐसा ही है
जैसे लावारिस बच्चे की आधी रात नींद खुल जाए ।

जैसे निर्णय कर लेने पर मन में एक द्विधा रह जाए
जैसे बचपन की क़िताब में कोई फूल मुँदा रह जाए,
मेरे मन पर तेरी यादें अब भी कुछ ऐसे अँकित हैं
जैसे खँडहर पर शासक का शासन-काल खुदा रह जाए ।
-रमेश गौड़

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

तू मुझे इतने प्यार से मत देख -अली सरदार जाफ़री


तू मुझे इतने प्यार से मत देख
तेरी पलकों के नर्म साये में
धूप भी चांदनी सी लगती है
और मुझे कितनी दूर जाना है
रेत है गर्म, पाँव के छाले
यूँ दमकते हैं जैसे अंगारे
प्यार की ये नज़र रहे, न रहे
कौन दश्त-ए-वफ़ा में जाता है
तेरे दिल को ख़बर रहे न रहे
तू मुझे इतने प्यार से मत देख
-अली सरदार जाफ़री