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सोमवार, 31 दिसंबर 2018

नए साल की शुभकामनाएं ! -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

गूगल से साभार 

नए साल की शुभकामनाएँ!
खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को
नए साल की शुभकामनाएं! 

जाँते के गीतों को बैलों की चाल को
करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को
चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को
नए साल की शुभकामनाएँ!

वीराने जंगल को तारों को रात को
ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को
हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे
उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे
नए साल की शुभकामनाएँ!
-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

रविवार, 30 दिसंबर 2018

बाबुल तुम बगिया के तरुवर -गोपाल सिंह नेपाली

गूगल से साभार 
बाबुल तुम बगिया के तरुवर, हम तरुवर की चिड़ियाँ रे
दाना चुगते उड़ जाएँ हम, पिया मिलन की घड़ियाँ रे
उड़ जाएँ तो लौट न आयें, ज्यों मोती की लडियां रे 
बाबुल तुम बगिया के तरुवर …….

आँखों से आँसू निकले तो पीछे तके नहीं मुड़के
घर की कन्या बन का पंछी, फिरें न डाली से उड़के 
बाजी हारी हुई त्रिया की 
जनम -जनम सौगात पिया की 
बाबुल तुम गूंगे नैना, हम आँसू की फुलझड़ियाँ रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आएँ ज्यों मोती की लडियाँ रे 

हमको सुध न जनम के पहले , अपनी कहाँ अटारी थी
आँख खुली तो नभ के नीचे , हम थे गोद तुम्हारी थी 
ऐसा था वह रैन -बसेरा 
जहाँ सांझ भी लगे सवेरा 
बाबुल तुम गिरिराज हिमालय , हम झरनों की कड़ियाँ रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे 

छितराए नौ लाख सितारे , तेरी नभ की छाया में 
मंदिर -मूरत , तीरथ देखे , हमने तेरी काया में 
दुःख में भी हमने सुख देखा 
तुमने बस कन्या मुख देखा 
बाबुल तुम कुलवंश कमल हो , हम कोमल पंखुड़ियां रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे 

बचपन के भोलेपन पर जब , छिटके रंग जवानी के 
प्यास प्रीति की जागी तो हम , मीन बने बिन पानी के 
जनम -जनम के प्यासे नैना 
चाहे नहीं कुंवारे रहना 
बाबुल ढूंढ फिरो तुम हमको , हम ढूंढें बावरिया रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे 

चढ़ती उमर बढ़ी तो कुल -मर्यादा से जा टकराई 
पगड़ी गिरने के दर से , दुनिया जा डोली ले आई 
मन रोया , गूंजी शहनाई 
नयन बहे , चुनरी पहनाई 
पहनाई चुनरी सुहाग की , या डाली हथकड़ियां रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे 

मंत्र पढ़े सौ सदी पुराने , रीत निभाई प्रीत नहीं 
तन का सौदा कर के भी तो , पाया मन का मीत नहीं 
गात फूल सा , कांटे पग में 
जग के लिए जिए हम जग में 
बाबुल तुम पगड़ी समाज के , हम पथ की कंकरियां रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे 

मांग रची आंसू के ऊपर , घूंघट गीली आँखों पर 
ब्याह नाम से यह लीला ज़ाहिर करवाई लाखों पर 

नेह लगा तो नैहर छूता , पिया मिले बिछुड़ी सखियाँ 
प्यार बताकर पीर मिली तो नीर बनीं फूटी अंखियाँ 
हुई चलाकर चाल पुरानी
नयी जवानी पानी पानी 
चली मनाने चिर वसंत में , ज्यों सावन की झाड़ियाँ रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे 

देखा जो ससुराल पहुंचकर , तो दुनिया ही न्यारी थी 
फूलों सा था देश हरा , पर कांटो की फुलवारी थी 
कहने को सारे अपने थे 
पर दिन दुपहर के सपने थे 
मिली नाम पर कोमलता के , केवल नरम कांकरिया रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे 

वेद-शास्त्र थे लिखे पुरुष के , मुश्किल था बचकर जाना 
हारा दांव बचा लेने को , पति को परमेश्वर जाना 
दुल्हन बनकर दिया जलाया 
दासी बन घर बार चलाया 
माँ बनकर ममता बांटी तो , महल बनी झोंपड़िया रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे 

मन की सेज सुला प्रियतम को , दीप नयन का मंद किया 
छुड़ा जगत से अपने को , सिंदूर बिंदु में बंद किया 
जंजीरों में बाँधा तन को 
त्याग -राग से साधा मन को 
पंछी के उड़ जाने पर ही , खोली नयन किवाड़ियाँ रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे 

जनम लिया तो जले पिता -माँ , यौवन खिला ननद -भाभी 
ब्याह रचा तो जला मोहल्ला , पुत्र हुआ तो बंध्या भी 
जले ह्रदय के अन्दर नारी 
उस पर बाहर दुनिया सारी
मर जाने पर भी मरघट में , जल - जल उठी लकड़ियाँ रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे 

जनम -जनम जग के नखरे पर , सज -धजकर जाएँ वारी 
फिर भी समझे गए रात -दिन हम ताड़न के अधिकारी 
पहले गए पिया जो हमसे अधम बने हम यहाँ अधम से 
पहले ही हम चल बसें , तो फिर जग बाटें रेवड़ियां रे 
उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
-गोपाल सिंह नेपाली

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

प्रेम के लिए फांसी (ऑन ऑनर किलिंग) -अनामिका

गूगल से साभार 

मीरारानी तुम तो फिर भी खुशकिस्मत थीं,

तुम्हे जहर का प्याला जिसने भी भेजा,
वह भाई तुम्हारा नहीं था,

भाई भी भेज रहे हैं इन दिनों
जहर के प्याले!

कान्हा जी जहर से बचा भी लें,
कहर से बचायेंगे कैसे!

दिल टूटने की दवा
मियाँ लुकमान अली के पास भी तो नहीं होती!

भाई ने जो भेजा होता
प्याला जहर का,
तुम भी मीराबाई डंके की चोट पर
हंसकर कैसे ज़ाहिर करतीं कि
साथ तुम्हारे हुआ क्या!

"राणा जी ने भेजा विष का प्याला"
कह पाना फिर भी आसान था,

"भैया ने भेजा"- ये कहते हुए
जीभ कटती!

कि याद आते वे झूले जो उसने झुलाए थे
बचपन में,
स्मृतियाँ कशमकश मचातीं;
ठगे से खड़े रहते
राह रोककर

सामा-चकवा और बजरी-गोधन के सब गीत :
"राजा भैया चल ले अहेरिया,
रानी बहिनी देली आसीस हो न,
भैया के सिर सोहे पगड़ी,
भौजी के सिर सेंदुर हो न..."

हंसकर तुम यही सोचतीं-
भैया को इस बार
मेरा ही आखेट करने की सूझी?
स्मृतियाँ उसके लिए क्या नहीं थीं?

स्नेह, सम्पदा, धीरज-सहिष्णुता
क्यों मेरे ही हिस्से आई,

क्यों बाबा ने
ये उसके नाम नहीं लिखीं?
-अनामिका

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

भागी हुई लड़कियां -आलोक धन्वा

गूगल से साभार 

एक 


घर की जंजीरें 
कितना ज्यादा दिखाई पड़ती हैं 
जब घर से कोई लड़की भागती है 

क्या उस रात की याद आ रही है 
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी 
जब भी कोई लड़की घर से भगती थी? 
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट 
महज आंखों की बेचैनी दिखाने भर उनकी रोशनी? 

और वे तमाम गाने रजतपरदों पर दीवानगी के 
आज अपने ही घर में सच निकले! 

क्या तुम यह सोचते थे 
कि वे गाने महज अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए 
रचे गए? 
और वह खतरनाक अभिनय 
लैला के ध्वंस का 
जो मंच से अटूट उठता हुआ 
दर्शकों की निजी जिन्दगियों में फैल जाता था? 

दो 

तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं 
कभी वह खत 
जिसे भागने से पहले 
वह अपनी मेज पर रख गई 
तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से 
उसका संवाद 
चुराओगे उसका शीशा उसका पारा 
उसका आबनूस 
उसकी सात पालों वाली नाव 
लेकिन कैसे चुराओगे 
एक भागी हुई लड़की की उम्र 
जो अभी काफी बची हो सकती है 
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में? 

उसकी बची-खुची चीजों को 
जला डालोगे? 
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे? 
जो गूंज रही है उसकी उपस्थिति से 
बहुत अधिक 
सन्तूर की तरह 
केश में 

तीन 

उसे मिटाओगे 
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे 
उसके ही घर की हवा से 
उसे वहां से भी मिटाओगे 
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर 
वहां से भी 
मैं जानता हूं 
कुलीनता की हिंसा ! 

लेकिन उसके भागने की बात 
याद से नहीं जाएगी 
पुरानी पवनचिक्कयों की तरह 

वह कोई पहली लड़की नहीं है 
जो भागी है 
और न वह अन्तिम लड़की होगी 
अभी और भी लड़के होंगे 
और भी लड़कियां होंगी 
जो भागेंगे मार्च के महीने में 

लड़की भागती है 
जैसे फूलों गुम होती हुई 
तारों में गुम होती हुई 
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई 
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में 

चार 

अगर एक लड़की भागती है 
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है 
कि कोई लड़का भी भागा होगा 

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं 
जिनके साथ वह जा सकती है 
कुछ भी कर सकती है 
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है 

तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत 
घर से बाहर 
लड़कियां काफी बदल चुकी हैं 
मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा 
कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो 

वह कहीं भी हो सकती है 
गिर सकती है 
बिखर सकती है 
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में 
गलतियां भी खुद ही करेगी 
सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक 
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी 
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी 

पांच 

लड़की भागती है 
जैसे सफेद घोड़े पर सवार 
लालच और जुए के आरपार 
जर्जर दूल्हों से 
कितनी धूल उठती है 

तुम 
जो 
पत्नियों को अलग रखते हो 
वेश्याओं से 
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो 
पत्नियों से 
कितना आतंकित होते हो 
जब स्त्री बेखौफ भटकती है 
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व 
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों 
और प्रमिकाओं में ! 

अब तो वह कहीं भी हो सकती है 
उन आगामी देशों में 
जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा 

छह 

कितनी-कितनी लड़कियां 
भागती हैं मन ही मन 
अपने रतजगे अपनी डायरी में 
सचमुच की भागी लड़कियों से 
उनकी आबादी बहुत बड़ी है 

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी? 

क्या तुम्हारी रातों में 
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं? 

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया? 
क्या तुम उसे उठा लाए 
अपनी हैसियत अपनी ताकत से? 
तुम उठा लाए एक ही बार में 
एक स्त्री की तमाम रातें 
उसके निधन के बाद की भी रातें ! 

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी 
किसी स्त्री के सीने से लगकर 

सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
तुमसे नहीं कहा किसी स्त्री ने 
सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
कितनी-कितनी बार कहा कितनी स्त्रियों ने दुनिया भर में 
समुद्र के तमाम दरवाजों तक दौड़ती हुई आयीं वे 

सिर्फ आज की रात रुक जाओ 
और दुनिया जब तक रहेगी 
सिर्फ आज की रात भी रहेगी
- आलोक धन्वा

गुरुवार, 27 दिसंबर 2018

इक बगल में चाँद होगा - पीयूष मिश्रा

गूगल से साभार
इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ
इक बगल में नींद होगी, इक बगल में लोरियाँ
हम चाँद पे, हम चाँद पे,
रोटी की चादर डाल कर सो जाएँगे
और नींद से, और नींद से कह देंगे
लोरी कल सुनाने आएँगे

इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ
इक बगल में नींद होगी, इक बगल में लोरियाँ
हम चाँद पे, रोटी की चादर डाल के सो जाएँगे
और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे

एक बगल में खनखनाती, सीपियाँ हो जाएँगी
एक बगल में कुछ रुलाती सिसकियाँ हो जाएँगी
हम सीपियो में, हम सीपियो में भर के सारे
तारे छू के आएँगे
और सिसकियो को, और सिसकियो को
गुदगुदी कर कर के यूँ बहलाएँगे
और सिसकियों को, गुदगुदी कर कर के यूँ बहलाएँगे

अब न तेरी सिसकियों पे कोई रोने आएगा
गम न कर जो आएगा वो फिर कभी ना जाएगा
याद रख पर कोई अनहोनी नहीं तू लाएगी
लाएगी तो फिर कहानी और कुछ हो जाएगी
याद रख पर कोई अनहोनी नहीं तू लाएगी
लाएगी तो फिर कहानी और कुछ हो जाएगी

होनी और अनहोनी की परवाह किसे है मेरी जान
हद से ज़्यादा ये ही होगा कि यहीं मर जाएँगे
हम मौत को, हम मौत को सपना बता कर
उठ खड़े होंगे यहीं
और होनी को, और होनी को ठेंगा दिखा कर
खिलखिलाते जाएँगे ,
और होनी को ठेंगा दिखा कर खिलखिलाते जाएँगे
और होनी को ठेंगा दिखा कर खिलखिलाते जाएँगे

    - पीयूष मिश्रा

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

सन्नाटा - भवानीप्रसाद मिश्र

गूगल से साभार 

तो पहले अपना नाम बता दूँ तुमको,
फिर चुपके चुपके धाम बता दूँ तुमको
तुम चौंक नहीं पड़ना, यदि धीमे धीमे
मैं अपना कोई काम बता दूँ तुमको।

कुछ लोग भ्रान्तिवश मुझे शान्ति कहते हैं,
कुछ निस्तब्ध बताते हैं, कुछ चुप रहते हैं
मैं शांत नहीं निस्तब्ध नहीं, फिर क्या हूँ
मैं मौन नहीं हूँ, मुझमें स्वर बहते हैं।

कभी कभी कुछ मुझमें चल जाता है,
कभी कभी कुछ मुझमें जल जाता है
जो चलता है, वह शायद है मेंढक हो,
वह जुगनू है, जो तुमको छल जाता है।

मैं सन्नाटा हूँ, फिर भी बोल रहा हूँ,
मैं शान्त बहुत हूँ, फिर भी डोल रहा हूँ
ये सर सर ये खड़ खड़ सब मेरी है
है यह रहस्य मैं इसको खोल रहा हूँ।

मैं सूने में रहता हूँ, ऐसा सूना,
जहाँ घास उगा रहता है ऊना-ऊना
और झाड़ कुछ इमली के, पीपल के
अंधकार जिनसे होता है दूना।

तुम देख रहे हो मुझको, जहाँ खड़ा हूँ,
तुम देख रहे हो मुझको, जहाँ पड़ा हूँ
मैं ऐसे ही खंडहर चुनता फिरता हूँ
मैं ऐसी ही जगहों में पला, बढ़ा हूँ।

हाँ, यहाँ किले की दीवारों के ऊपर,
नीचे तलघर में या समतल पर या भू पर
कुछ जन श्रुतियों का पहरा यहाँ लगा है,
जो मुझे भयानक कर देती है छू कर।

तुम डरो नहीं, वैसे डर कहाँ नहीं है,
पर खास बात डर की कुछ यहाँ नहीं है
बस एक बात है, वह केवल ऐसी है,
कुछ लोग यहाँ थे, अब वे यहाँ नहीं हैं।

यहाँ बहुत दिन हुए एक थी रानी,
इतिहास बताता नहीं उसकी कहानी
वह किसी एक पागल पर जान दिये थी,
थी उसकी केवल एक यही नादानी!

यह घाट नदी का, अब जो टूट गया है,
यह घाट नदी का, अब जो फूट गया है
वह यहाँ बैठकर रोज रोज गाता था,
अब यहाँ बैठना उसका छूट गया है।

शाम हुए रानी खिड़की पर आती,
थी पागल के गीतों को वह दुहराती
तब पागल आता और बजाता बंसी,
रानी उसकी बंसी पर छुप कर गाती।

किसी एक दिन राजा ने यह देखा,
खिंच गयी हृदय पर उसके दुख की रेखा
यह भरा क्रोध में आया और रानी से,
उसने माँगा इन सब साँझों का लेखा-जोखा।

रानी बोली पागल को जरा बुला दो,
मैं पागल हूँ, राजा, तुम मुझे भुला दो
मैं बहुत दिनों से जाग रही हूँ राजा,
बंसी बजवा कर मुझको जरा सुला दो।

वो राजा था हाँ, कोई खेल नहीं था,
ऐसे जवाब से उसका कोई मेल नहीं था
रानी ऐसे बोली थी, जैसे इस 
बड़े किले में कोई जेल नहीं था।

तुम जहाँ खड़े हो, यहीं कभी सूली थी,
रानी की कोमल देह यहीं झूली थी
हाँ, पागल की भी यहीं, रानी की भी यहीं,
राजा हँस कर बोला, रानी तू भूली थी।

किन्तु नहीं फिर राजा ने सुख जाना,
हर जगह गूँजता था पागल का गाना
बीच बीच में, राजा तुम भूले थे,
रानी का हँसकर सुन पड़ता था ताना।

तब और बरस बीते, राजा भी बीते,
रह गये किले के कमरे रीते रीते
तब मैं आया, कुछ मेरे साथी आये,
अब हम सब मिलकर करते हैं मनचीते।

पर कभी कभी जब वो पागल आ जाता है,
लाता है रानी को, या गा जाता है
तब मेरे उल्लू, साँप और गिरगिट पर
एक अनजान सकता-सा छा जाता है।
- भवानीप्रसाद मिश्र

मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

प्रेम की हूक (घनाक्षरी छंद) -आशुतोष द्विवेदी

गूगल से साभार 

प्रसंग: - कृष्ण मथुरा जा चुके हैं | बहुत दिन बीत गए हैं | अचानक एक दिन राधा को प्रेम की तेज़ हूक उठती है और वह अपनी सखियों से कहती है... ।

श्याम रंग में रंगे बरसने लगे जो मेघ,
रिमझिम बाँसुरी की तान लगने लगी ।
वायु में भी कृष्ण की हँसी सुनाई दे रही है,
सृष्टि साँवरे का परिधान लगने लगी ।
कल रात मोहन जो सपने में आया सखी !
जीवन से कोई पहचान लगने लगी ।
जाने किस आसन पे मुझको बिठा दिया कि
धरती ये धूरि के समान लगने लगी ।।१।।

रागिनी थिरक उठी आज मेरे अधरों पे,
जैसे बही मलय-बयार मरुथल से ।
अंग-अंग में सखी री ! दामिनी मचल उठी,
खिल गए व्याकुल नयन भी कमल से ।
जिस पल साँवरे ने निंदिया चुरा ली मेरी,
भावना को चैन नहीं आए उस पल से ।
बाँध गया मन को कि मोह नहीं टूटता है,
छलिया ने बाँसुरी बजाई बड़े छल से ।।२।।

रोम-रोम दोहरा रहा है श्याम-श्याम आज,
बन में पपीहा जैसे बोलता पिया-पिया ।
सारा खेद, सारी पीर, अँखियों का सारा नीर,
मोहन कि एक मुस्कान में भुला दिया ।
नेह का ये तीर कब भावना के पार हुआ,
आज तक इसको समझ न सका हिया ।
माखन चुराने वाले जसुदा के लाडले ने,
जाने किस पल मेरे मन को चुरा लिया ।।३।।

अँखियों में साँवरा है, बतियों में साँवरा है,
सारी भूमि श्याम का निवास लगने लगी ।
किन्तु बोलते ही बोलते जो रोई राधा रानी,
पावस में जैसे मधुमास लगने लगी ।
सोचती हैं गोपियाँ कि हर्ष के प्रसंग बीच,
राधिका क्यों इतनी उदास लगने लगी ।
प्रेम की पिपासिता का मन कैसे तृप्त होगा !
देख नदिया को फिर प्यास लगने लगी ।।४।।
-आशुतोष द्विवेदी

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

मैं कब कहता हूँ - बशीर बद्र

गूगल से साभार 
मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है
मगर उसने मुझे चाहा बहुत है


खुदा इस शहर को महफ़ूज़ रखे
ये बच्चो की तरह हँसता बहुत है


मैं हर लम्हे मे सदियाँ देखता हूँ
तुम्हारे साथ एक लम्हा बहुत है


मेरा दिल बारिशों मे फूल जैसा
ये बच्चा रात मे रोता बहुत है


वो अब लाखों दिलो से खेलता है
मुझे पहचान ले, इतना बहुत है
- बशीर बद्र 

रविवार, 23 दिसंबर 2018

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको - अदम गोंडवी

गूगल से साभार 
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेखबर कृष्णा बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्णा थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

बोला कृष्णा से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर

क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्णा है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"

"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा

होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -

"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे

"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"
 
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा

इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"

बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्णा का हाल"
 
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए!
-अदम गोंडवी